कोलकाता/मुंबई : बॉलीवुड के ‘डिस्को डांसर’ Mithun Chakraborty सिर्फ फिल्मों के सुपरस्टार ही नहीं, बल्कि राजनीति के भी पुराने खिलाड़ी रहे हैं। बंगाल की राजनीति में दशकों तक सक्रिय रहने, अलग-अलग दलों के साथ मंच साझा करने और बीजेपी के लिए गांव-गांव प्रचार करने के बावजूद उन्होंने कभी किसी बड़े पद की खुली दावेदारी नहीं की। यही वजह है कि एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर मिथुन दा सत्ता के इतने करीब होकर भी सत्ता से दूर क्यों रहे?



नक्सल आंदोलन से शुरू हुआ सफर……
1960 के दशक के अंत में, जब मिथुन कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे, उस समय बंगाल में वामपंथी और नक्सल आंदोलन का जबरदस्त प्रभाव था। युवा मिथुन भी इस आंदोलन से जुड़े और कथित तौर पर नक्सली नेता Charu Majumdar के करीबी माने जाते थे।
बताया जाता है कि बड़े भाई की मौत के बाद परिवार के दबाव में उन्होंने आंदोलन छोड़ दिया। उस समय बंगाल में नक्सलियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई तेज हो चुकी थी। मिथुन ने कोलकाता छोड़ा और पुणे के FTII में दाखिला लेकर अभिनय की दुनिया की ओर कदम बढ़ा दिए।
फिल्मों में संघर्ष, फिर सुपरस्टारडम……
मुंबई पहुंचने के बाद मिथुन को शुरुआत में हीरो के लायक नहीं माना गया। लेकिन छोटी-छोटी भूमिकाओं से शुरुआत करने वाले मिथुन जल्द ही करोड़ों दिलों की धड़कन बन गए। उस दौर में Amitabh Bachchan सुपरस्टार थे, लेकिन मिथुन को भी उनकी कुर्सी का दावेदार माना जाने लगा।
इसके बावजूद मिथुन ने कभी अहंकार नहीं दिखाया और कई फिल्मों में अमिताभ से छोटी भूमिकाएं भी स्वीकार कीं। बाद में उन्होंने ऊटी में अपना होटल और फिल्म स्टूडियो खड़ा कर लो-बजट फिल्मों की अलग इंडस्ट्री तैयार कर दी।
CPM से TMC और फिर BJP तक का सफर……
फिल्मों में कामयाबी मिलने के बाद भी मिथुन की राजनीतिक सक्रियता खत्म नहीं हुई। वह लंबे समय तक वामपंथी राजनीति के करीब रहे और पूर्व मुख्यमंत्री Jyoti Basu के करीबी माने जाते थे। CPM के फंड जुटाने वाले कार्यक्रमों में वह मुफ्त में परफॉर्म भी करते थे।
ज्योति बसु के निधन के बाद मिथुन ने वामपंथ से दूरी बनाई और 2014 में All India Trinamool Congress (TMC) में शामिल होकर राज्यसभा पहुंचे।
हालांकि, 2016 में शारदा चिटफंड घोटाले में नाम आने के बाद उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। बाद में उन्होंने खुद इसे “गलत फैसला” बताया।
इसके पांच साल बाद, 7 मार्च 2021 को प्रधानमंत्री Narendra Modi की मौजूदगी में मिथुन ने Bharatiya Janata Party (BJP) का दामन थाम लिया।
बीजेपी के लिए जमकर प्रचार, लेकिन नहीं मांगा पद……
2021 और 2026 के बंगाल विधानसभा चुनावों में मिथुन चक्रवर्ती बीजेपी के सबसे बड़े स्टार प्रचारकों में शामिल रहे। गांव-गांव और गली-गली जाकर उन्होंने पार्टी के लिए माहौल बनाया। मंचों पर पीएम मोदी और मिथुन की नजदीकी भी कई बार साफ नजर आई।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि मिथुन को मुख्यमंत्री या कम से कम मंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन जब हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में उनका नाम किसी पद के लिए सामने नहीं आया, तब साफ हो गया कि मिथुन दा खुद भी पद की राजनीति से दूरी बनाए हुए हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि बीजेपी में शामिल हुए करीब पांच साल हो चुके हैं, लेकिन पार्टी ने उन्हें राज्यसभा तक नहीं भेजा और न ही उन्होंने इसकी कोई सार्वजनिक इच्छा जताई।
“मैं गरीबों के लिए राजनीति में आया हूं”…….
बीजेपी जॉइन करते वक्त मिथुन ने कहा था कि उनका सपना गरीबों के साथ खड़ा होना है। उन्होंने साफ कहा था कि लोग उन्हें “मतलबी” कह सकते हैं, लेकिन उनका मकसद सिर्फ गरीबों की लड़ाई लड़ना है।
आज की राजनीतिक तस्वीर को देखकर यही लगता है कि मिथुन चक्रवर्ती ने सत्ता से ज्यादा अपनी छवि और जनता से जुड़ाव को महत्व दिया। शायद यही वजह है कि मंच पर बिना किसी पद के भी ‘मिथुन दा’ की चमक बरकरार है।
