सौरभ कुमार।। जादूगोड़ा/लोकतंत्र सवेरा
कभी जेबकतरे भीड़ में जेब काटते थे, अब साइबर अपराधी मोबाइल स्क्रीन के पीछे बैठकर लोगों की जिंदगी उजाड़ रहे हैं। चेहरा नहीं दिखता, लोकेशन पकड़ में नहीं आती, आवाज बदल जाती है और कुछ ही मिनटों में मेहनत की पूरी कमाई खाते से गायब हो जाती है। जादूगोड़ा में लगातार बढ़ रहे साइबर ठगी के मामले अब महज आपराधिक घटनाएं नहीं रह गए हैं, बल्कि यह डिजिटल व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र की विफलता का आईना बन चुके हैं।



मोबाइल चोरी होते ही बैंक खाता साफ हो जाना, KYC अपडेट के नाम पर लाखों की ठगी, रिटायर्ड कर्मचारियों की जीवनभर की जमा-पूंजी मिनटों में ट्रांसफर हो जाना अब आम घटनाएं बन चुकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर साइबर अपराधियों के मन से कानून और कार्रवाई का डर खत्म क्यों हो चुका है?
जादूगोड़ा में फैलता साइबर अपराधियों का नेटवर्क……
जादूगोड़ा और आसपास के क्षेत्रों में साइबर अपराधियों का नेटवर्क तेजी से फैलता जा रहा है। खासकर यूसीआईएल कर्मी और रिटायर्ड कर्मचारी ठगों के निशाने पर हैं। मेहनत की कमाई, पेंशन और वर्षों की बचत पलक झपकते ही गायब हो रही है।
पूर्व कर्मी गुरदीप सिंह से ठगी का मामला हो या अर्जुन शर्मा के खाते से लाखों रुपये की निकासी, हर घटना एक ही कहानी बयां कर रही है—अपराधी संगठित हैं, तकनीक में माहिर हैं और सिस्टम की धीमी प्रक्रिया का फायदा उठाकर आसानी से बच निकलते हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई मामलों में पीड़ितों ने तुरंत थाना पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई, सिम बंद कराया और बैंक को सूचना दी, इसके बावजूद रकम सुरक्षित नहीं रह सकी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि यदि समय पर शिकायत के बाद भी पैसा नहीं बच सकता, तो आम आदमी आखिर किस भरोसे डिजिटल बैंकिंग करे?
खबरें छपती हैं… लेकिन इंसाफ नहीं पहुंचता……
हर साइबर ठगी के बाद एक तय प्रक्रिया शुरू होती है। पुलिस बयान लेती है, मामला दर्ज होता है, जांच का भरोसा दिया जाता है, अखबारों में खबरें छपती हैं और कुछ दिनों बाद मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है। लेकिन पीड़ित का दर्द खत्म नहीं होता।
जिस व्यक्ति की पूरी जमा-पूंजी चली जाती है, उसके लिए यह सिर्फ बैंक बैलेंस का मामला नहीं होता। वह मानसिक रूप से टूट जाता है। हर फोन कॉल संदिग्ध लगने लगता है। खुद को दोषी मानने लगता है और पूरा परिवार तनाव में डूब जाता है। विडंबना यह है कि साइबर अपराध पीड़ितों के लिए मानसिक सहायता जैसी कोई ठोस व्यवस्था तक मौजूद नहीं है।
डिजिटल इंडिया बनाम असुरक्षित नागरिक…….
सरकार लगातार डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग को बढ़ावा दे रही है, लेकिन जब डिजिटल अपराध होता है तो पीड़ित खुद को पूरी तरह अकेला महसूस करता है। यही वजह है कि अब आम लोगों के बीच यह सवाल खुलकर उठने लगा है कि क्या साइबर अपराधियों से ज्यादा कमजोर कानून और जांच व्यवस्था हो चुकी है?
लगातार बढ़ती घटनाओं के बीच कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं— क्या स्थानीय स्तर पर साइबर जांच के लिए पर्याप्त तकनीकी संसाधन मौजूद हैं? क्या बैंकों और जांच एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत है? क्या ठगी के बाद शुरुआती “गोल्डन टाइम” में उतनी तेजी से कार्रवाई हो रही है, जितनी होनी चाहिए?
अगर जवाब “नहीं” है, तो इसका सीधा मतलब है कि देश डिजिटल तो हो गया, लेकिन उसकी सुरक्षा व्यवस्था उतनी तेज और मजबूत नहीं बन पाई।
सबसे खतरनाक है असुरक्षा का एहसास…..
आज लोग सिर्फ साइबर ठगी से नहीं डर रहे, बल्कि इस बात से डरे हुए हैं कि अगर उनके साथ ठगी हुई तो शायद उन्हें न्याय नहीं मिलेगा। यही डर सबसे ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि जब जनता का भरोसा टूटता है, तब सिर्फ बैंकिंग सिस्टम नहीं, पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ने लगती है।
एक तरफ देश “डिजिटल इंडिया” का सपना दिखा रहा है, दूसरी तरफ आम आदमी यह सोचकर सहमा हुआ है कि कहीं अगला OTP उसकी जिंदगी की पूरी कमाई न निगल जाए। मोबाइल फोन अब सुविधा कम और भय का कारण ज्यादा बनता जा रहा है।
आखिर समाधान कब?
हर बार सिर्फ जागरूकता अभियान चलाना काफी नहीं है। जरूरत है तेज और प्रभावी साइबर रिस्पॉन्स सिस्टम की। जरूरत है ठगी के तुरंत बाद अकाउंट फ्रीज करने की मजबूत व्यवस्था की। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में साइबर जांच को तकनीकी रूप से मजबूत करने की। और सबसे जरूरी, पीड़ितों को यह भरोसा दिलाने की कि वे अकेले नहीं हैं।
जब तक अपराधियों की गिरफ्तारी तेज नहीं होगी और पीड़ितों की रकम वापस दिलाने की ठोस व्यवस्था नहीं बनेगी, तब तक लोगों का विश्वास लौटना मुश्किल है।
आज जादूगोड़ा सवाल पूछ रहा है… कल पूरा देश पूछेगा…
अगर मेहनत की कमाई कुछ मिनटों में गायब हो सकती है और महीनों बाद भी इंसाफ का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दिखता, तो आखिर आम नागरिक खुद को सुरक्षित माने भी कैसे?



