सरकार और संस्थागत हिस्सेदारी के बीच बोर्ड संरचना पर उठे गंभीर सवाल, कथित अनियमित नियुक्ति को लेकर ROC रांची में शिकायत की तैयारी
जमशेदपुर : आदित्यपुर ऑटो क्लस्टर की कार्यप्रणाली और निदेशक मंडल की संरचना को लेकर उठे सवाल अब कंपनी कानून और कॉरपोरेट अनुपालन के दरवाजे तक पहुंच गए हैं। एक चर्चित सफेदपोश व्यक्ति की निदेशक पद पर नियुक्ति को लेकर कथित अनियमितता के आरोप सामने आने के बाद अब रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (ROC), रांची से मामले की जांच और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की मांग किए जाने की बात सामने आ रही है।

मामला सिर्फ किसी एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि ऑटो क्लस्टर के निदेशक मंडल का गठन किस आधार पर हुआ, किस संस्था ने किसे नामित किया और वर्षों से चली आ रही कथित अनियमितता पर अब तक किसी की नजर क्यों नहीं गई?
2015 से स्वतंत्र निदेशक! योग्यता और हितों के टकराव पर सवाल……
उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित व्यक्ति वर्ष 2015 से स्वतंत्र निदेशक के रूप में जुड़े बताए जाते हैं। शिकायत में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या वे स्वतंत्र निदेशक के लिए निर्धारित वैधानिक पात्रता और स्वतंत्रता की शर्तों को पूरा करते हैं. शिकायतकर्ता का दावा है कि संबंधित व्यक्ति एसिया से जुड़े रहे हैं और स्वयं शेयरधारक भी हैं। ऐसे में उनकी स्वतंत्र निदेशक के रूप में नियुक्ति और उसके बाद बोर्ड में उनकी भूमिका की वैधानिक स्थिति की जांच जरूरी बताई जा रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया में कोई वैधानिक कमी थी तो वह इतने लंबे समय तक कैसे कायम रही? और यदि कोई अनियमितता हुई है तो उसे दुरुस्त करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
ROC के सामने जाएगा पूरा मामला…..
न्यू इस्पात मेल में खबर प्रकाशित होने के बाद इस मुद्दे ने और तूल पकड़ लिया है। अब संबंधित पक्ष द्वारा ROC रांची के समक्ष शिकायत भेजकर कंपनी के निदेशक मंडल, नियुक्ति प्रक्रिया, नामांकन, बोर्ड प्रस्ताव और MCA/ROC में दाखिल दस्तावेजों की जांच की मांग किए जाने की तैयारी है. शिकायत में यह स्पष्ट किए जाने की मांग होगी कि संबंधित निदेशक की नियुक्ति किस प्रस्ताव के तहत हुई, किस संस्था अथवा समूह ने उनका नामांकन किया और क्या उस समय लागू कंपनी कानून एवं कंपनी के संविधानों के अनुरूप पूरी प्रक्रिया अपनाई गई थी।
सरकारी हिस्सेदारी बड़ी, तो सरकारी प्रतिनिधित्व का हिसाब भी जरूरी…….
आदित्यपुर ऑटो क्लस्टर की स्थापना का उद्देश्य स्थानीय उद्योगों के विकास, तकनीकी सहयोग और औद्योगिक अधोसंरचना को मजबूत करना रहा है। इसके गठन में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, तत्कालीन आयडा/जियाडा, एसिया और उद्यमियों की भूमिका रही है. ऐसे में यदि सरकारी अथवा संस्थागत हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है, तो बोर्ड में उसका प्रभावी और पारदर्शी प्रतिनिधित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।
सवाल सीधा है—जिस संस्थान में सार्वजनिक और संस्थागत हित जुड़े हैं, वहां बोर्ड की संरचना और निर्णय प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है?
9 निदेशक दर्ज, मगर किसका प्रतिनिधित्व—यह साफ होना बाकी…….
उपलब्ध कॉरपोरेट रिकॉर्ड के अनुसार आदित्यपुर ऑटो क्लस्टर में वर्तमान में नौ निदेशक दर्ज हैं। इनमें जियाडा के प्रेम रंजन नॉमिनी निदेशक के रूप में दर्ज बताए जाते हैं।
ऐसे में अब यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि…….
– वर्तमान नौ निदेशकों में कौन किस संस्था का प्रतिनिधित्व कर रहा है?
– किस निदेशक का नामांकन किस संस्था ने किया?
– नियुक्ति की तारीख और आधार क्या था?
– क्या सभी नियुक्तियां वर्तमान कंपनी कानून और कंपनी के संविधानों के अनुरूप हैं?
– क्या किसी निदेशक की संस्थागत संबद्धता उसके स्वतंत्र निदेशक होने की पात्रता को प्रभावित करती है?
– और क्या समय-समय पर बोर्ड की संरचना की वैधानिक समीक्षा हुई?
बोर्ड में एसिया का प्रभाव कितना?…….
वर्तमान बोर्ड से जुड़े उपलब्ध विवरणों को लेकर यह भी सवाल उठ रहा है कि कितने निदेशक वर्तमान अथवा पूर्व में एसिया से संस्थागत रूप से जुड़े रहे हैं. हालांकि किसी व्यक्ति की संस्थागत संबद्धता अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है, लेकिन यदि स्वतंत्र निदेशक की स्वतंत्रता अथवा हितों के टकराव पर सवाल उठाए जा रहे हैं तो संबंधित दस्तावेजों के आधार पर स्थिति साफ होना जरूरी है।
यहीं से एक बड़ा सवाल जन्म लेता है—ऑटो क्लस्टर का संचालन संस्था के हित में हो रहा है या कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों के प्रभाव का दायरा लगातार बढ़ता गया?
कभी दिग्गज उद्यमियों से सजा था बोर्ड……
ऑटो क्लस्टर के शुरुआती दौर में विक्टर सिंह, एस.के. बेहरा, विकास मुखर्जी, अतुल दुआ, किलोल डी. कमानी, दिलीप गोयल और सज्जन कुमार नरेडी जैसे उद्यमियों के नाम निदेशक मंडल से जुड़े रहे हैं. अब यह भी पड़ताल का विषय है कि समय के साथ अनुभवी उद्यमियों की बोर्ड में मौजूदगी किस तरह बदली और वर्तमान संरचना तक पहुंचते-पहुंचते बोर्ड का स्वरूप क्या हो गया. क्या यह केवल सामान्य संस्थागत बदलाव था या धीरे-धीरे किसी सीमित समूह का प्रभाव बढ़ता गया—इसका जवाब दस्तावेज ही दे सकते हैं।
सरकार और जियाडा से अब सीधे सवाल……
ऑटो क्लस्टर में सरकारी और संस्थागत हित जुड़े होने के कारण अब जियाडा और राज्य सरकार से भी पूरे मामले की दस्तावेजी समीक्षा की अपेक्षा की जा रही है।
सवाल यह नहीं कि कौन निदेशक है। सवाल यह है कि…..
कौन किसके प्रतिनिधि के रूप में आया?
कब आया?
किस प्रस्ताव से आया?
किस संस्था ने नामित किया? और आज वह किसका प्रतिनिधित्व करता है?यदि इन सवालों के जवाब दस्तावेजों में साफ हैं तो विवाद समाप्त हो सकता है। लेकिन यदि कहीं प्रक्रिया में खामी है तो उसे समय रहते दुरुस्त करना भी संस्थागत जिम्मेदारी है।
मुद्दा व्यक्ति नहीं, संस्थान की पारदर्शिता का……
इस पूरे मामले को किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ अभियान के तौर पर देखने के बजाय ऑटो क्लस्टर की संस्थागत पारदर्शिता, कॉरपोरेट गवर्नेंस और उद्योगहित के नजरिए से देखा जाना चाहिए. जिस संस्था की स्थापना औद्योगिक विकास और उद्यमियों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हुई हो, वहां बोर्ड की संरचना, सरकारी प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक रूप से गंभीर विषय बन जाता है।
आगे की पड़ताल—कहानी अभी बाकी है……..
ऑटो क्लस्टर का मामला अब सिर्फ निदेशक मंडल तक सीमित नहीं रहने वाला है। सवाल यह भी है कि किसी संस्थान में प्रभाव की शुरुआत कहां से होती है और वह धीरे-धीरे निर्णय प्रक्रिया तथा संस्थागत नियंत्रण तक कैसे पहुंचता है. एसिया, लघु उद्योग भारती, टाटानगर-बासुकीनाथ धर्मशाला और अन्य संस्थागत उदाहरणों से जुड़े सवालों की भी दस्तावेजी पड़ताल किए जाने की बात सामने आ रही है. इसी कड़ी में पार्वती घाट से जुड़ा अध्याय भी आगे की पड़ताल का हिस्सा हो सकता है. फिलहाल निगाहें ROC रांची, जियाडा और राज्य सरकार की ओर हैं. दस्तावेज खुलेंगे तो तस्वीर भी साफ होगी—कौन प्रतिनिधि, कौन हिस्सेदार और किसके हाथ में कितना प्रभाव?
