लोकतंत्र सवेरा | करीब एक दशक पहले का वह दौर याद कीजिए, जब गणेश पूजा महज धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, भाईचारे, संस्कार और सामाजिक एकजुटता का पर्व हुआ करती थी। गली-मोहल्लों में गणपति की प्रतिमा स्थापित होती थी। आरती होती थी, प्रसाद बंटता था और विसर्जन के दौरान पूरा वातावरण एक ही जयकारे से गूंज उठता था—

“गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस तू जल्दी आना।”
लोग नाचते थे, गाते थे, झूमते थे… लेकिन उस नाच में श्रद्धा होती थी। ढोल की थाप होती थी, मगर उसमें भक्ति की धुन सुनाई देती थी। प्रतिमा के साथ चलने वाली भीड़ में न कोई बड़ा था, न छोटा। सबके चेहरे पर एक ही भाव होता था—बप्पा को विदाई और अगले बरस फिर उनके आने का इंतजार।
लेकिन वक्त बदला… और शायद पूजा का रंग भी बदलने लगा।
‘गणपति बप्पा मोरया’ की जगह कौन-सी आवाज?
आज धार्मिक आयोजनों की भव्यता निश्चित रूप से बढ़ी है। पंडाल बड़े हुए हैं, रोशनी बढ़ी है, साउंड सिस्टम अत्याधुनिक हुए हैं और जुलूसों की भव्यता भी कई जगह देखने लायक होती है।
लेकिन इसी चमक-दमक के बीच एक सवाल चुपचाप खड़ा है……
क्या आयोजन जितना बड़ा हुआ, भक्ति भी उतनी ही बड़ी हुई?
विसर्जन के दौरान जहां कभी भक्ति गीत और “गणपति बप्पा मोरया” की गूंज सुनाई देती थी, वहीं आज कुछ जगहों पर ऐसे गाने और संवाद भी सुनाई देने लगे हैं, जिनका धर्म और भक्ति से कोई सीधा संबंध नहीं।
“समझाव तानी… समझ जाइए, नहीं तो रेल दिया जाएगा!”…….
सवाल यह नहीं कि कौन-सा गाना बज रहा है। सवाल इससे कहीं बड़ा है. क्या हमारे धार्मिक आयोजनों की भाषा और संस्कृति भी बदल रही है? क्या भक्ति अब धीरे-धीरे शक्ति प्रदर्शन में बदल रही है?क्या पूजा अब आस्था से ज्यादा प्रतिष्ठा और वर्चस्व का विषय बनती जा रही है?
“हम पीछे क्यों रहें?”…….
आज कई जगहों पर तस्वीर कुछ ऐसी नजर आती है कि एक पूजा समिति दूसरी से कम भव्य दिखना नहीं चाहती। किसका पंडाल सबसे बड़ा? किसकी लाइटिंग सबसे शानदार? किसका साउंड सिस्टम सबसे ताकतवर?
किसका जुलूस सबसे लंबा?
किसका प्रभाव सबसे ज्यादा?
मानो भगवान की भक्ति नहीं, बल्कि वर्चस्व की प्रतियोगिता चल रही हो।
एक तरफ से आवाज आती है
“हमारी पूजा सबसे बड़ी होनी चाहिए।” दूसरी तरफ से जवाब मिलता है. “हम किसी से पीछे नहीं रहेंगे।” और यहीं से शुरू होती है दिखावे और शक्ति प्रदर्शन की वह दौड़, जिसका कोई अंत दिखाई नहीं देता।
पूजा है या शक्ति प्रदर्शन?…..
धर्म इंसान को विनम्र बनाता है। पूजा मनुष्य के भीतर संयम और संवेदना पैदा करती है। भगवान के सामने सिर झुकाने का अर्थ ही यही है कि इंसान अपने अहंकार को कुछ देर के लिए पीछे रखे। लेकिन जब धार्मिक आयोजन ही अहंकार की अभिव्यक्ति बनने लगें तो सवाल उठना स्वाभाविक है. “भगवान के सामने हम झुक रहे हैं या भगवान के नाम पर एक-दूसरे को झुकाने की कोशिश कर रहे हैं?”
यह सवाल किसी एक पूजा समिति, किसी एक मोहल्ले या किसी एक वर्ग से नहीं है. यह सवाल पूरे समाज से है।
“बप्पा सबको जोड़ने आते हैं, फिर हम बंट क्यों रहे हैं?”…..
गणेश भगवान को विघ्नहर्ता कहा जाता है। उन्हें बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है. फिर उन्हीं के नाम पर आयोजित होने वाला पर्व यदि विवाद, प्रतिस्पर्धा, शोर और वर्चस्व की मानसिकता का माध्यम बनने लगे, तो क्या हमें कुछ पल ठहरकर अपने भीतर नहीं झांकना चाहिए?
एक बुजुर्ग की कही बात आज के दौर पर बिल्कुल फिट बैठती है. “पहले हम भगवान के लिए पूजा करते थे, अब लगता है कि लोग पूजा अपने लिए करने लगे हैं।” बात कड़वी है… लेकिन सवाल उससे भी बड़ा है।
भव्यता जरूरी है, लेकिन भक्ति उससे बड़ी है. भव्य पूजा के खिलाफ सवाल नहीं होना चाहिए। अच्छी सजावट हो, आकर्षक पंडाल हों, सांस्कृतिक कार्यक्रम हों, रोशनी हो, श्रद्धालुओं की सुविधा हो—यह सब उत्सव का हिस्सा है. लेकिन भव्यता की सीमा वहां खत्म होनी चाहिए, जहां से दूसरे की परेशानी शुरू होती है।
अगर साउंड इतना तेज हो कि बुजुर्ग, बच्चे और बीमार लोग परेशान हों…
अगर जुलूस के कारण सड़कें घंटों जाम रहें…
अगर एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ तनाव पैदा करे…
अगर धार्मिक गीतों की जगह आपत्तिजनक या उकसाने वाली भाषा हावी होने लगे…
तो फिर सवाल पूछना जरूरी है. “आखिर हम किस चीज का उत्सव मना रहे हैं?”
दस साल पहले और आज…
दस साल पहले शायद साधन कम थे, लेकिन अपनापन ज्यादा था. आज साधन ज्यादा हैं, आयोजन ज्यादा भव्य हैं, तकनीक ज्यादा आधुनिक है. लेकिन सवाल है. क्या हमारी संवेदनशीलता भी उसी अनुपात में बढ़ी है?पहले विसर्जन के समय आवाज आती थी. “गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस तू जल्दी आना।” आज कई बार शोर इतना ज्यादा होता है कि उस एक जयकारे की आत्मा ही कहीं खो जाती है।
अगली पीढ़ी को हम क्या सिखा रहे हैं?…..
आज का बच्चा वही सीखेगा, जो वह अपने आसपास देखेगा. अगर वह देखेगा कि पूजा का मतलब सेवा है. तो वह सेवा सीखेगा. अगर वह देखेगा कि पूजा का मतलब भाईचारा है. तो वह भाईचारा सीखेगा. अगर वह देखेगा कि पूजा का मतलब संस्कार और संयम है—तो वही उसके जीवन का हिस्सा बनेगा. लेकिन अगर वह देखेगा कि पूजा का मतलब शोर, शक्ति प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व है, तो कल का समाज भी उसी दिशा में आगे बढ़ेगा।
फिर हम शिकायत करेंगे……
“आज के बच्चों में संस्कार नहीं हैं।” लेकिन अगला सवाल भी तो होगा. “संस्कार हमने उन्हें सिखाए कब थे?”
बप्पा को क्या चाहिए—शोर या श्रद्धा?
भगवान को ऊंचे मंच, महंगे साउंड सिस्टम या सबसे बड़े जुलूस की जरूरत नहीं….. उत्सव की असली खूबसूरती तब है, जब उससे समाज जुड़े, टूटे नहीं। ढोल बजे लेकिन किसी की परेशानी बनकर नहीं। जुलूस निकले लेकिन रास्ता रोकने की जिद के साथ नहीं। भव्यता हो लेकिन अहंकार के साथ नहीं।
प्रतिस्पर्धा हो तो सेवा में। आवाज हो तो भक्ति की।
क्योंकि पूजा की असली ताकत डेसिबल में नहीं, दिल में होती है।
अब सवाल हमसे है………
गणेश पूजा भगवान की आराधना है या अपनी ताकत दिखाने का मंच? क्या हम सच में बप्पा का स्वागत कर रहे हैं या एक-दूसरे को अपनी ताकत का एहसास करा रहे हैं? क्या हम उत्सव मना रहे हैं या अनजाने में अपने बच्चों के सामने एक ऐसी संस्कृति तैयार कर रहे हैं, जहां “कौन कितना ताकतवर” होना ही सबसे बड़ी पहचान बन जाए?
सबसे बड़ा सवाल……….
“कहां जा रहा हमारा समाज… और किस दिशा में ले जा रहे हैं हम अपने समाज को?” गणपति बुद्धि और विवेक के देवता हैं। इसलिए शायद इस बार जरूरत सिर्फ बप्पा को घर लाने की नहीं…उनसे थोड़ी बुद्धि, थोड़ा विवेक, थोड़ा संयम और थोड़ी संवेदना मांगने की भी है।
क्योंकि उत्सव तभी सार्थक है, जब उसके बाद समाज थोड़ा और बेहतर बने… थोड़ा और संवेदनशील बने… थोड़ा और संस्कारी बने… और सबसे जरूरी थोड़ा और इंसान बने।
फिर वही जयकारा……..
गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस जल्दी आना। लेकिन इस बार एक छोटी-सी प्रार्थना के साथ “बप्पा, अगले बरस जरूर आना… लेकिन अपने साथ हमारी खोती हुई संवेदना, विवेक और भाईचारा भी वापस लाना।” क्योंकि पंडाल कितना बड़ा है, यह महत्वपूर्ण नहीं…महत्वपूर्ण यह है कि हमारे दिल कितने बड़े हैं. भक्ति कितनी तेज आवाज में सुनाई देती है, यह महत्वपूर्ण नहीं… महत्वपूर्ण यह है कि उसकी आवाज हमारे व्यवहार में कितनी दिखाई देती है।
